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Wednesday, 23 May 2012

ये पब्लीक् है सब जांति है ?

ये पब्लीक है सब जानती है , अजी अन्दर क्या है बाहार क्या है , ये सब पह्चानती है । क्या वास्तव मे एसा है , या क्या वास्तव मे पब्लीक एसा मानती है ? ये लाइने बेशक कीसी फील्मी गीत की हो  सक्ती है पर क्या आज देश के जो हालात है । उसमे ये कह्ना बेमानी नही होगा ?  की देश की जनता सब जानती है । अगर पब्लीक सब जांती होती की कोन सा नेता कैसा है , भ्रष्ट है , चोर है , कातील है , बलात कारी है , या पापी, और लुटेरा है तो क्या पब्लीक इन सब को चुन कर विधान सभाओ, और लोक सभा, राज्य सभा मे भेजने की गलती थोडे करती , और अगर ये काहा जाये की ये सब जांते हुए भी जनता ने इन सब को चुन कर भेजा है तो मै यही कहुगा की जनता न केवल  प्रजातंत्र के प्रती उदासीन है बल्की देश के कानुन से जादा लोग इस टाईप के नेताओ पर जादा वीश्वास करते है जो जुल्म से जुडे है लेकीन आम आदमी इनकी बात मानता है । चाहे वो उस्के डर से ही एसा करते हो । याहां ये बात साबीत होती है की भय बिन प्रीत न होय गोपाला । 100 बात की एक बात देश का आम नागरीक चाहे वो डर से हो या जिवन यापन के चक्कर मे अनुशासन हीन हो चला है । इन सब को कानुन के भय से ही ठीक कीया जा सक्ता है ? जो राहा ही नही है । इन्ही सब के कारण आम आदमी कानुन के पास जाने के बजाये एसे भ्रष्ट  लोगो के पास जा कर अप्नी त्तकालीक पुर्ती और स्वार्थ सीद्धी कर लेते है । मै इन्ही माय्नो मे फील्मी गीत की वो पग्तीया गाता हु जिस्मे काहा गया है की ये पब्लीक है सब जांती है ............. की काहा उस्का लाभ है । इस बात को समझे की भ्रषट्राचार , लुट , चोरी, बलात्कार , हत्या जैसे जुर्म का समाधान अपने वोट से ही करना और हम्को मतदान आवश्यक कानुन और राजनीतीक पार्टीयो के घोषना पत्रो पर उपभोक्ता कानुन मे लाना होगा तभी सही मायने मे आम आदमी जागे गा और गाये गा की ये जो पब्लीक है सब जांती है ................. ?